पर्यावरण संरक्षण के साथ युग-निर्माण का स्पष्ट संदेश, शताब्दी समारोह के सांयकालीन सत्र में राष्ट्रीय नेतृत्व का प्रेरक संवाद

हरिद्वार।
परम् वंदनीया माताजी एवं अखण्ड दीपक शताब्दी समारोह के क्रम में आयोजित पर्यावरण एवं वातावरण शुद्धि संकल्प का द्वितीय सत्र आज गरिमामयी एवं प्रेरणादायी वातावरण में संपन्न हुआ। समाज, शासन, कृषि, अध्यात्म एवं विचार-जगत से जुड़े प्रतिष्ठित अतिथियों की उपस्थिति ने इस सत्र को व्यापक दृष्टि, स्पष्ट दिशा और राष्ट्रीय महत्व प्रदान किया।

शताब्दी समारोह के दलनायक एवं देव संस्कृति विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति आदरणीय डॉ. चिन्मय पंड्या जी ने अपने उद्बोधन में युग-निर्माण के पाँच मूल सूत्र—उपासना, साधना, आराधना, समयदान एवं अंशदान—को विस्तारपूर्वक प्रतिपादित किया। उन्होंने कहा कि पर्यावरण शुद्धि का वास्तविक आधार बाह्य प्रयासों के साथ-साथ अंतःकरण की शुद्धता है। उपासना चेतना को जाग्रत करती है, साधना व्यक्तित्व को सुदृढ़ बनाती है, आराधना समाज के प्रति उत्तरदायित्व का बोध कराती है, जबकि समयदान और अंशदान युग-परिवर्तन के व्यावहारिक माध्यम हैं। जब व्यक्ति, परिवार और समाज—तीनों स्तरों पर शुद्धता का संकल्प दृढ़ होता है, तभी स्थायी पर्यावरणीय परिवर्तन संभव होता है।

इस अवसर पर हिमाचल प्रदेश के माननीय राज्यपाल श्री शिव प्रताप शुक्ल जी, माननीय केंद्रीय जनजातीय कार्य राज्य मंत्री श्री दुर्गा दास उइके जी, दीनदयाल संस्थान के अध्यक्ष डॉ. अतुल जैन जी, पद्मश्री सम्मानित प्रगतिशील कृषक एवं कृषि नवाचारक श्री राम शरण वर्मा जी (बाराबंकी), जर्मनी से सांसद एवं जेएफडब्ल्यू के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री राहुल कुमार जी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय संपर्क प्रमुख श्री रामलाल जी, दिव्य प्रेम सेवा मिशन के अध्यक्ष डॉ. आशीष गौतम जी तथा ‘पाञ्चजन्य’ के मुख्य संपादक श्री हितेश शंकर जी की गरिमामयी उपस्थिति रही। सभी वक्ताओं ने अपने-अपने विचारों के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण को जीवन-शैली, सामाजिक उत्तरदायित्व और राष्ट्रीय कर्तव्य से जोड़ने का आह्वान किया।

सम्पूर्ण सत्र में यह संदेश स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आया कि शताब्दी समारोह केवल उत्सव या आयोजन मात्र नहीं है, बल्कि युग-निर्माण के लिए चेतना, चरित्र और कर्म—तीनों स्तरों पर सक्रिय सहभागिता का सशक्त आह्वान है। पर्यावरण शुद्धि, सामाजिक समरसता और नैतिक उत्थान—ये सभी एक-दूसरे से अविभाज्य हैं।

कार्यक्रम के समापन पर सप्तसंकल्प पाठ के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण एवं युग-निर्माण के संकल्प को सामूहिक चेतना में दृढ़ता के साथ प्रतिष्ठित किया गया। इस संकल्प के साथ प्रतिभागियों ने व्यक्तिगत जीवन में सकारात्मक परिवर्तन और समाज के लिए सक्रिय योगदान का दृढ़ निश्चय व्यक्त किया।