केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री
(भारत सरकार)
गायत्री परिवार द्वारा आयोजित शताब्दी समारोह में सम्बोधन कार्यक्रम
हरिद्वार (उत्तराखंड), 22 जनवरी 2026 लिंक
मेरे साथ दोनों हाथ उठा कर तन्मयता के साथ भारत माता का जयकारा लगाएंगे। भारत माता की जय! मंच पर उपस्थित आज के कार्यक्रम के उत्सव मूर्ति दलनायक जन्म शताब्दी समारोह श्रीमान डॉक्टर चिन्मय पंड्या जी, हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल महामहिम शिव प्रताप शुक्ला जी, मेरे परम मित्र और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री श्रीमान पुष्कर सिंह धामी जी, भारतीय जनता पार्टी उत्तराखंड के प्रदेश अध्यक्ष श्रीमान महेंद्र भट्ट जी, भाजपा के वरिष्ठ नेता श्रीमान मदन कौशिक जी, उत्तर प्रदेश के परिवहन मंत्री श्रीमान दयाशंकर सिंह जी और आज इस पंडाल में और आभासी रूप से ऑनलाइन जुड़े हुए गायत्री परिवार के सभी भक्त जनों को मेरा प्रणाम। राम राम।
मित्रों, यहां पर एक प्रकार से गायत्री परिवार के शताब्दी वर्ष का कार्यक्रम है। अखंड ज्योति के प्रागट्य के 100 साल हुए। वंदनीय माता भगवती देवी शर्मा के धरती पर अवतरण के भी 100 साल हुए और गुरुदेव पंडित राम शर्मा जी की तपस्या के भी 100 साल पूरे हुए। व्यक्ति के लिए 100 साल का जीवन एक प्रकार से पूर्णता माना जाता है। परंतु व्यक्ति निर्माण और पुनर्जागरण के लिए जो संस्थाएं काम करती है इनके लिए 100 साल शैशव काल होता है। नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ने का काल होता है। आज करोड़ों लोगों को गायत्री मंत्र के साथ, गायत्री उपासना के साथ, गायत्री साधना के साथ पंडित राम शर्मा ने जोड़ा। वो करोड़ों लोगों की जिम्मेदारी है कि चिन्मय भाई के नेतृत्व में 100 साल में नई ऊर्जा और जोश के साथ हम आगे बढ़े। इस तरह से आगे बढ़े, इस उत्साह से आगे बढ़े कि यही तपोभूमि पर यही सप्त ऋषियों की भूमि पर यही कुंभ भूमि पर गायत्री परिवार के 200 साल भी इससे भी ज्यादा उत्साह के साथ मनाएंगे और आज जो राष्ट्र निर्माण का संकल्प का दिन तय किया है मैं आपको बाद में बात करूंगा परंतु राष्ट्र निर्माण का संकल्प ये आज कितना समयोचित है इसकी भी मैं बात में बात करूंगा, परंतु मैं पंडित राम शर्मा के जीवन पर बात करना चाहता हूं। देश भर के इतिहास का देश के महापुरुषों का और आध्यात्मिक जीवन को ऊर्जा लेने वाले अनेक संतों के जीवन का मेरा गहरा अध्ययन है। मैं आज गायत्री परिवार के कार्यक्रम में आया हूं इसलिए नहीं कह रहा हूं। गायत्री परिवार की अखंड ज्योति की शताब्दी है इसलिए नहीं कह रहा हूं। मेरे मन की मान्यता है भारतवर्ष पंडित राम शर्मा के उपकारों से कभी मुक्त नहीं हो पाएगा। एक जीवन में करोड़ों लोगों को व्यक्ति निर्माण के आंदोलन के साथ जोड़ना, भक्ति के साथ जोड़ना, आध्यात्म के रास्ते पर प्रशस्त करना और गायत्री मंत्र का एक प्रकार से पुनर्जीवन करने का काम करना। सनातन धर्म में कई कुरीतियां आ गई। बहनें गायत्री मंत्र नहीं बोल सकती। क्यों नहीं बोल सकती? किसी के पास जवाब नहीं था। और ये कुरिती को तोड़ने का काम पंडित राम शर्मा ने किया। हर जाति, हर समाज और लिंग भेद के बगैर गायत्री मंत्र के माध्यम से हर आत्मा को कल्याण का मार्ग प्रशस्त करने का रास्ता पंडित गायत्री शर्मा ने किया। पंडित राम शर्मा जी ने मदन मोहन मालवीय ने जो उनको सीख दी थी कि गायत्री मंत्र के ज्ञान को जनजन तक पहुंचाओ उसको अपना जीवन मंत्र कर दिया। वसंत पंचमी के दिन ही अखंड ज्योति का प्रागट्य हुआ और फिर मथुरा की पुण्य भूमि से एक कुंभ क्षेत्र में गुरुदेव उसको लेकर आए और उन्होंने पूरा जीवन इसको समर्पित कर दिया। 1971 में इस पुण्य भूमि पर ज्योति का प्रागट्य हुआ। शांति कुंज की स्थापना हुई और गुरुदेव ने जो रास्ता बताया जो करोड़ों लोगों ने उस रास्ते पर चलना प्रशस्त किया। युग कोई धर्म नहीं बदल सकता। युग कोई धर्माचार्य भी नहीं बदल सकता। युग कोई फिलॉसोफी नहीं बदल सकती। इन्होंने एक सूत्र दिया,बड़ा सरल सूत्र दिया, मैं मानता हूं उस सूत्र ने पूरे भारत को रास्ता दिखाया। उन्होंने कहा हम बदलेंगे युग बदलेगा। जब तक व्यक्ति नहीं बदलता है, राष्ट्र भी नहीं बदलता है, समय भी नहीं बदलता है। युग बदलने का तो सवाल ही नहीं है। हर व्यक्ति को अच्छा व्यक्ति बनना, हर व्यक्ति को आध्यात्म के रास्ते पर जाना, अगर हर व्यक्ति आध्यात्म के रास्ते पर चल पड़ता है तो युग का परिवर्तन अपने आप हो जाता है। देखिए साहब देखते देखते देखते इतने सालों के कम समय में 15 करोड़ परिवार इस आंदोलन के साथ जुड़ गए। उन्होंने धर्म को कर्मकांड के आवरण से निकालकर वैज्ञानिक अध्यात्म के साथ जोड़ने का काम गुरुदेव ने किया। हम बदलेंगे युग बदलेगा और गायत्री मंत्र ये दोनों के बीच में गहरा रिश्ता है। गायत्री मंत्र संस्कृत में रचा गया एक मंत्र मात्र नहीं है। हमारे यहां सनातन धर्म में कल्पना है कि देव और दानव दोनों हमारे शरीर के अंदर बसते हैं। गायत्री मंत्र के 24 अक्षर जो है वह 24 सद ग्रंथियों को झंकृत करते हैं। जब आप आपकी नाभि से गायत्री मंत्र का उच्चारण करते हो वो 24 अक्षर तप, दान, वीरता, धैर्य, तेज, तपस ये सारे गुणों को पोषित करने वाली ग्रंथि को झंकृत करते हैं। और पद्मासन के अंदर नाभि से बोला गया गायत्री मंत्र हमारे अंदर की सद ग्रंथियों को झंकृत कर कर एक्टिवेट करता है और उसके साथ ही इसकी विरोधाभासी जो ग्रंथि है जिसको हमारे शास्त्रों ने असुर का कहा तप के सामने उपभोग है, वीरता के सामने कायरता है, दान के सामने लोभ है, वो 24 ग्रंथियों का शमन भी करता है और सद ग्रंथियों को उत्तेजित भी करता है। अगर हर व्यक्ति के अंदर ये 24 गुण गायत्री मंत्र के उच्चारण से बढ़ते हैं और साधक जब आगे बढ़ता है तो अपने आप सारे आवरण हटते जाते हैं। तो हम बदलेंगे का जो नारा है इसको उन्होंने गायत्री मंत्र के साथ जोड़ा। हम कैसे बदलेंगे? हमारी वृत्तियों को बदलेंगे। हमारे गुणों को बदलेंगे। सद्गुणों का विकास करेंगे और खराब गुणों का धीरे धीरे धीरे ह्रास कर कर हम आध्यात्म को जागृत कर कर आगे के रास्ते पर निकलेंगे। यह वैज्ञानिक आधार देने का काम पंडित राम शर्मा जी ने किया, गायत्री मंत्र की रचना समग्र पृथ्वी पर बसते मानवों के कल्याण के लिए की गई। मगर धीरे-धीरे वो कर्मकांड बनकर रह गया था। पंडित राम शर्मा ने गायत्री मंत्र को वैज्ञानिक आधार देकर नई ऊर्जा देने का काम किया। जो युवा मेरा भाषण सुन रहे हैं उनको मैं कहना चाहता हूं मुझे भी मेरे गुरु जी ने जब गायत्री मंत्र का अर्थ समझाया और उसका उच्चारण करने की पद्धति समझाई उसके बाद में मेरी सोच मेरे व्यक्तित्व मेरी बुद्धि और मेरे आत्मा की गति में बहुत बड़ा परिवर्तन आया। आप एक बार मन से प्रयोग कर कर देखिए पंडित शर्मा के आशीर्वाद प्राप्त कर कर स्वार्थ छूटता जाएगा, परमार्थ बढ़ता जाएगा, कायरता निकलती जाएगी, हिंसा बगैर की वीरता अपना स्थान ले लेगी और बुद्धि सदमार्ग पर प्रवृत्त हो जाएगी और ये अखंड ज्योति बिना किसी विज्ञापन के बिना बिना किसी बाहरी सहायता से 100 से अधिक भाषाओं में करोड़ों लोगों के पास पहुंचती है। ये पंडित राम शर्मा और वंदनीय माता जी की एक प्रकार से तपस्या का परिणाम है। बचपन से देशभक्त रहे। आजादी के लिए संघर्ष किया। नमक सत्याग्रह में अंग्रेजों की लाठियां भी खाई और आजादी के बाद समाज में पनपी हुई कुरीतियों के खिलाफ पंडित राम शर्मा ने आंदोलन छेड़ा। जातपात की बेड़ियों को तोड़ी, समाज को बराबरी का रास्ता दिखाया और महिलाओं को गायत्री मंत्र की उपासना करने का अधिकार दिया। आज यहां पहला दिन था। उस वक्त चिन्मई जी ने आदिवासी भाइयों को यहां बुलाया था। इससे बड़ा काम चिन्मय जी कोई नहीं। आपने बहुत अच्छा किया और एक प्रकार से पंडित राम शर्मा के रास्तों को आप आगे ले जाने का काम किया। कई सारी कुरीतियां उन्होंने दहेज हटाएंगे ऐसा नहीं कहा। मेरी बात ध्यान से सुनिएगा। दहेज नहीं लेंगे नहीं कहा। उन्होंने नेगेटिविटी नहीं करी। दहेज मुक्त विवाह को हम अपनाएंगे ऐसा कहा। रचनात्मक दृष्टि से दूषणों को बाहर किया। व्यसन से मुक्ति प्राप्त करने का अभियान चलाया। गंगा सफाई का अभियान चलाया। और वृक्षारोपण भी आज चिन्मन भाई ने मुझे गाड़ी में बताया कि हर जिले में 1 लाख वृक्ष वाले बोने का जो अभियान लिया है वो पर्यावरण की इससे बड़ी कोई सेवा नहीं और ये जो उन्होंने सूत्र दिया अपने आप को सुधारना संसार की सबसे बड़ी सेवा है। वो सूत्र कई सारे लोगों के जीवन ने प्रकाश को भरा है। देश पर जब संकट आता है चाहे गायत्री परिवार का कोई भी व्यक्ति हो ,बाढ़ हो, भूकंप हो या महामारी हो सेवा करने वाली संस्थाओं की सूची दिखते हैं तो गायत्री परिवार उसमें हमेशा आगे रहता है। मुट्ठी भर अन्न और समय दान वो देश भर के समाज के उत्थान के लिए काम करने वाला जो संगठन है उनके लिए अनुकरणीय सूत्र बन गए। मुट्ठी अन्न का संकल्प उसने संस्थाओं को किसी धनपति या किसी धन्नासेठों से मुक्त कर दिया और समय दान इसने कोई प्रचार के बगैर मुख सेवा कर कर विचार को घर-घर पहुंचाने वाले कार्यकर्ताओं की फौज खड़ी। जब 1990 में आचार्य श्री ने शरीर को त्यागा तब सबके मन में एक विचार आया था कि अब क्या होगा ये आंदोलन का और अद्भुत ऊर्जा के साथ माता जी ने 15 लाख लोगों के बीच में घोषणा की ये मिशन देव द्वारा संचालित मिशन है, यह रुकेगा नहीं और तेजी से बढ़ेगा। माता जी ने इसको आगे बढ़ाया। फिर प्रणव भाई और अब चिन्मय जी। ये मिशन देव द्वारा संचालित मिशन है। वो अपने आप में आत्मविश्वास तभी आता है जब मिशनों के उद्देश्यों के मिशन के उद्देश्यों के बारे में संपूर्ण स्पष्ट था। उन्होंने बलि बगर के अश्वमेघ को किया चित्रकूट में और 1008 कुंड में 10 लाख लोगों ने अपने व्यसन की बलि चढ़ाने का काम किया। और जब से सनातन धर्म शुरू हुआ तब से अपने आप में एक ऐसा पहला अश्वमेघ यज्ञ था जिसमें लोगों ने अपने व्यसनों की बलि चढ़ाई।
आज मैं देवभूमि उत्तराखंड में आया हूं, देवभूमि में पैर रखते ही हजारों हजारों साल की तपस्या की ऊर्जा का अनुभव होता है। देवभूमि में भी मैं हरिद्वार में आया हूं, यह कुंभ क्षेत्र है। सप्त ऋषियों की तपस्व तपस्या की भूमि है। अनगिनत संतों ने यहां अपने आत्मा के साथ-साथ करोड़ों लोगों की आत्मा को जागृत कर कर आध्यात्म के रास्ते पर प्रशस्त करने का पुरुषार्थ इसी भूमि पर किया है। यही भूमि पर पंडित राम शर्मा और वंदनीय माता जी ने गायत्री ऊर्जा को जागृत करने का काम किया है। आज अखंड ज्योति सम्मेलन में आकर मैं साच अर्थ में अखंड ऊर्जा और चेतना की अनुभूति कर रहा हूं। यह मेरा मन ही जानता है यहां से कितनी चेतना लेकर मैं वापस जाऊंगा। आस्था, आध्यात्म और संस्कृति ये तीनों का ये संगम स्थल है। पूजनीय पंडित जी ने, श्री राम शर्मा जी ने आस्था, आध्यात्म और संस्कृति ये तीनों को पुनर्जीवित करने के लिए व्यक्ति निर्माण का रास्ता चुना। हर व्यक्ति के अंदर बसे हुए परमात्मा रूपी आत्मा को जागरूक और ऊर्जावान करने का काम किया। आज मैं तो चिन्मय जी को अभिनंदन देना चाहता हूं, बहुत-बहुत अभिनंदन देना चाहता हूं। चारों सम्मेलनों का थीम उनका बड़ा प्रशंसनीय है। परंतु आज उन्होंने राष्ट्र निर्माण का संकल्प का जो काम लिया है वो साच अर्थ में बहुत पसंद है। मित्रों जो लोग सनातन धर्म को जानते हैं, भारतीय संस्कृति को जानते हैं, भारत के इतिहास को जानते हैं, वो सभी को सिर्फ मान्यता नहीं दृढ़ विश्वास है कि विश्व भर की समस्याओं का समाधान अगर कहीं एक जगह है तो भारतीय परंपरा में विश्व भर की समस्याओं का समाधान है, तो आध्यात्मिक रूप से भारत का पुनर्निर्माण वो सिर्फ भारत के लिए नहीं समग्र विश्व के लिए कल्याणकारी होने वाला है। कई सारे अर्थ दृष्टाओं ने स्वामी विवेकानंद जी हो, महर्षि अरविंद हो, या पूजनीय पंडित राम शर्मा जी, ये सब ने अपनी ओजस्वी वाणी में विश्वास व्यक्त किया है कि जब भारत अपने पूर्ण तेज के साथ जागृत होगा समग्र विश्व को समग्र ब्रह्मांड को तेजोमय बनाएगा और मुझे विश्वास है ऐसी मनिषियों की ऐसे आर्य दृष्टाओं की वाणी कभी विफल नहीं जाती है। उनके मुख से जो सत्य वचन निकले हैं, इसको हम सब ने ब्रह्मा के वचन मानकर ही आगे बढ़ना पड़ेगा और विश्वास के साथ आगे बढ़ना। पंडित राम शर्मा ने भक्ति को मंदिर के गर्भ गुरु से निकालकर लोगों के मुंह तक जीहवा तक, आत्मा तक पहुंचाने का काम किया गायत्री मंत्र के माध्यम से। ये आज जो विशाल समागम दिख पड़ा है, सातों नगरों में भी आभासी स्वरूप से इसको गायत्री परिवार के सभी लोग देख रहे हैं और देश और विश्व भर में देख रहे हैं। इतना बड़ा भक्तों का समूह एक जीवन में सृजित करना इससे बड़ा कोई काम नहीं हुआ। युग दृष्टा पंडित श्री राम शर्मा आचार्य और वंदनीय माता भगवती देवी ये दोनों ने अनेक जीवनों का काम अनेक युगों का काम अपने एक ही नश्वर देह के समय में कर कर दिखाया। एक ऐसा वट वृक्ष बनाया जो वटवृक्ष की छांव में 100 से अधिक देशों में 15 करोड़ से ज्यादा अनुयायी आज आध्यात्म के मार्ग पर,अपने आत्मा के कल्याण का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं। और आज ये अखंड ज्योति की सती मनाई जा रही है। आप कल्पना करिए 1925-26 से लेकर 2026 तक एक ही मार्ग पर एक ही ध्येय के साथ एक ही लक्ष्य के साथ ना केवल एक व्यक्ति ना केवल एक विचार करोड़ों लोगों को साथ में लेकर आगे बढ़ना कितनी ऊर्जा होगी पंडित जी के जीवन में उनके विचार में उनके कर्मों में कि उनके जाने के इतने वर्षों बाद भी अखंड ज्योति ना केवल जलती रही। करोड़ों लोगों के दिल में आत्मा के दीपक के रूप में वो अखंड ज्योति ने स्थान दे दिया। ये 1925-26 का साल ये साच अर्थ में राष्ट्रीय पुनर्जागरण का साल रहा। उसी वर्ष राष्ट्रीय स्वयंसेवक की संघ की स्थापना हुई और संघ भी आज जन्मशती मना रहा है। उसी वक्त भाई जी ने गीता प्रेस गोरखपुर की स्थापना की वो भी आज जन्मशती मना रहा है। और अखंड ज्योति जो प्रज्वलित हुई और वंदनीय माता जी का भी जन्मशती का वर्ष है। एक प्रकार से यह सभी काम एक ही वर्ष में शुरू होने का मतलब है कि वह वर्ष को ईश्वर ने ही भारत के पुनर्जागरण के लिए निर्मित किया होगा। मैं आज पंडित राम शर्मा जी ने गायत्री परिवार की परंपरा की जो स्थापना की महामना मदन मोहन मालवीय का जिस आंदोलन को आशीर्वाद मिले वह आंदोलन वो परंपरा और उसका भाग स्वरूप आप सभी को मन पूर्वक प्रणाम करता हूं।
मित्रों, यह जो आंदोलन चला है इसने सनातन धर्म को वैज्ञानिकता देने का काम किया। पंडित राम शर्मा ने कहा धर्म और विज्ञान एक दूसरे के पूरक है। एक दूसरे के विरोधी नहीं है। और सनातन धर्म और विज्ञान तो एक दूसरे के पूरक ही है। जिनको धर्म का ज्ञान नहीं है वो उसको अंधश्रद्धा मानते हैं। जिसको धर्म का ज्ञान है, वह जरूर इसको वैज्ञानिक रूप एसेस कर पाता है। आध्यात्म को तर्क की कसौटी पर कसने की पहली बार शुरुआत पंडित राम शर्मा ने की और यहां ब्रह्म वर्चस्व शोध संस्थान की स्थापना भी की। वैज्ञानिक आध्यात्मवाद ये आधुनिक भारत में देने का संपूर्ण श्रेय किसी एक व्यक्ति को जाता है तो पंडित राम शर्मा के हाथ में जाता है। मैं आया था देव संस्कृति विद्यालय में। मेरा भाषण रखा था प्रणव जी ने। मुझे तो आश्चर्य हुआ। हाथ में एक हाथ में वेद और दूसरे हाथ में लैपटॉप लिए हुए युवाओं को जब मैंने देखा तो मन एक अनेक प्रकार की शांति से निश्चिंत हो गया। जब इस देश का युवा वेद, उपनिषद और पुराणों को आगे बढ़ाता है और साथ में विज्ञान का भी आधार रहता है तो हम जरूर आगे बढ़ेंगे।
मित्रों, अभी-अभी कुछ साल पहले हमारे देश की आजादी की 75 साल 75वीं वर्षगांठ मनाई गई। 75वीं वर्षगांठ के वक्त नरेंद्र मोदी जी ने कई प्रकार से उसको मनाने का संकल्प किया। उस वक्त आजादी के आंदोलन का इतिहास इस देश के किशोर और युवाओं के सामने रखने का काम किया। एक-एक गांव में जो आजादी के आंदोलन लड़ने वाले स्वतंत्र सेनानी थे उसको ढूंढ-ढूंढ कर उनका महिमा मंडन करने का काम किया। आजादी से अब तक 75 साल तक देश ने जिन जिन क्षेत्रों में विकास किया है उसको भी पूरे देश के सामने रखकर गौरव भरने का काम किया। मगर तीसरा काम बड़ा महत्वपूर्ण था। उन्होंने आजादी के 75व वर्ष में अमृत काल की घोषणा की। क्या है अमृत काल? अमृतकाल आजादी के 75 वर्ष से 100 साल तक की यात्रा है। उन्होंने एक संकल्प इस देश की जनता के 130 करोड़ की जनता के लिए घोषित किया कि हम सब भारतीय मिलकर जब आजादी की शताब्दी मनाई जाएगी। 15 अगस्त 2047 को एक ऐसे भारत की रचना करेंगे जो हर एक क्षेत्र में विश्व में सर्वप्रथम होगा। ऐसे भारत के और एक पूर्ण विकसित परंतु भौतिकता से योजनों दूर आध्यात्मिकता के रास्ते पर आगे बढ़ता हुआ भारत की रचना की संकल्पना नरेंद्र मोदी जी ने की और देखते देखते एक संकल्प देश के 140 करोड़ लोगों का संकल्प बना।
मित्रों, कॉलेज में ये संकल्प पर वक्तव्य देने का एक बच्ची खड़ी हो गई। इन्होंने कहा आपको लगता है क्या हमारे संकल्प लेने से देश आगे बढ़ जाएगा? तब मैंने उसको कहा था एक व्यक्ति जब एक कदम उठाता है तो एक ही कदम उठता है। 140 करोड़ लोग एक दिशा में एक कर कदम उठाते हैं तो 140 कदम देश आगे बढ़ता है। 140 करोड़ कदम देश आगे और इस संकल्प को समाज सेवी संस्थाओं की मदद के बगैर पूरा नहीं किया जा सकता। आज मैं गायत्री परिवार के मंच पर आया हूं। हमारे युवा नेता चिन्मय जी को भी कहना चाहता हूं। ये संकल्प जो है ये भारत का संकल्प है। पूर्ण विकसित भारत बनाने का। भारत माता को सर्वोच्च स्थान पर विराजमान करने का यह संकल्प गायत्री परिवार का भी संकल्प। पंडित राम शर्मा जी ने जो व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण व्यक्ति निर्माण से युग निर्माण इसकी संकल्पना रखी है हर नागरिक को हम ऐसे भारत के निर्माण की संकल्पना के साथ जोड़ दें और स्वामी विवेकानंद जी को चिन्मय जी ने क्वोट किया विवेकानंद जी ने एक बार कहा था कि सारे सारे देवी देवताओं के मंदिर कुछ समय कर बंद कर कर उसमें भारत माता की मूर्ति को प्रस्थापित कर कर हम भारत माता की आराधना तो गायत्री मंत्र से हमारे अंदर जो सदवत्तियों की वृद्धि होती है। एक चेतना जागृत होती है। आध्यात्म के रास्ते पर हम प्रशस्त होते हैं। ये सभी ऊर्जा चेतना का उपयोग हम ऐसे भारत की रचना करने के लिए बनाएं जो भारत न केवल अपना समग्र ब्रह्मांड के कल्याण की कल्पना के साथ पूरे विश्व की कल्पना के लिए कल्याण के लिए आगे बढ़े।
मित्रों, आज मैं आप सभी को बताना चाहता हूं इस 10 वर्ष के अंदर देश में काफी परिवर्तन हो गए। वर्षों से जिसकी राह देखते थे 500 साल से रामलल्ला अपमानित अवस्था में बैठे थे वहां आज अयोध्या में भव्य मंदिर का निर्माण हो गया। औरंगजेब ने तोड़ा हुआ काशी विश्वनाथ कॉरिडोर आज फिर से बन चुका है। 16 बार टूटने के बाद आज सोमनाथ का मंदिर ददीप्यमान होकर सनातन की भगवी ध्वजा को शिखर तक पहुंचा। धारा 370 हट चुकी है। देश कॉमन सिविल कोड के रास्ते पर आगे बढ़ चुका है। आज एक जमाने में हिंदुत्व की बात करने में भी लोग झिझकते थे। आज गर्व से हमारी संस्कृति और हमारे धर्म की बात करते हैं। मैं तो आज आया हूं गायत्री परिवार के मंच पर, ऐसे राष्ट्र के निर्माण में गायत्री परिवार भी लगे। व्यक्ति निर्माण से समाज निर्माण और व्यक्ति के परिवर्तन से युग परिवर्तन का जो नारा पंडित राम शर्मा ने दिया वो 130 करोड़ भारतीयों का नारा बने और हम सर्वोच्च स्थान पर बैठे हुई भारत माता को अपने जीवन काल में देख पाए। मैं फिर से एक बार पंडित राम शर्मा, वंदनीय माता जी, डॉक्टर प्रणव जी और अब डॉक्टर चिन्मय जी ने ये जो ऊर्जा का प्रवाह प्रवाहित किया है उसको वंदन कर कर बहुत-बहुत साधुवाद देता हूं और फिर से एक बार मैं आप सभी से विनती करा करूंगा कि दोनों हाथ उठाकर एक बार भारत माता का जयकारा लगाएं। मेरे साथ बोलिए, बोलिए प्रचंड आवाज से, भारत माता की जय! भारत माता की जय! वंदे मातरम! वंदे मातरम! बहुत-बहुत धन्यवाद और मैं देर से आया हूं इसलिए आप सभी का क्षमा प्रार्थी हूँ।

