डेढ़ लाख दीपों की ज्योति से आलोकित हुआ शताब्दी समारोह स्थल

हरिद्वार | 22 जनवरी

वैरागी द्वीप स्थित शताब्दी समारोह स्थल मंगलवार की सांय बेला उस समय दिव्य प्रकाश से जगमगा उठा, जब अखण्ड दीपक से प्रज्वलित डेढ़ लाख दीपकों और सौ से अधिक मशालों ने संपूर्ण परिसर को युग-चेतना के प्रकाश से भर दिया। दृश्य ऐसा था मानो आस्था, साधना और राष्ट्रचेतना एक साथ साकार हो उठी हो।

पीतवस्त्रधारी साधकों की सुसंगठित पंक्तियाँ, हाथों में प्रज्वलित मशालें और अनुशासित मौन—यह सब मिलकर एक ऐसे विराट दीप महायज्ञ का साक्ष्य बने, जिसे देखने के लिए विशाल पंडाल में उपस्थित हजारों श्रद्धालु भाव-विभोर दिखाई दिए।

अखण्ड ज्योति की यात्रा बनी आकर्षण का केंद्र

इस अवसर पर शांतिकुंज में विगत सौ वर्षों से निरंतर प्रज्वलित अखण्ड दीपक को आदरणीया श्रद्धेया जिजी द्वारा विधिवत रूप से वैरागी कैंप एवं शताब्दी समारोह स्थल तक लाया गया। उसी अखण्ड ज्योति से दीप महायज्ञ का शुभारंभ हुआ। जैसे ही पहली मशाल प्रज्वलित हुई, पूरा पंडाल जयघोष और श्रद्धा की निस्तब्धता से गूंज उठा।

अंतरराष्ट्रीय सहभागिता, मौन साधना में लीन श्रद्धालु

दीप महायज्ञ के दौरान देश-विदेश से आए श्रद्धालु भी दीप प्रज्वलन करते दिखाई दिए। हाथ जोड़े, नेत्र बंद किए साधकों की साधना यह दर्शा रही थी कि यह आयोजन केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और संकल्प का क्षण है। महिलाओं, युवाओं और वरिष्ठ साधकों की समान सहभागिता ने आयोजन को और भी गरिमामय बना दिया।

गुरुदेव–माताजी के चित्रों के समक्ष श्रद्धा अर्पण

दीप महायज्ञ से पूर्व परम पूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी एवं परम वंदनीया माता भगवती देवी शर्मा जी के चित्रों के समक्ष विधिवत श्रद्धा अर्पण किया गया। दीप, पुष्प और मंत्रोच्चार के साथ वातावरण पूर्णतः आध्यात्मिक हो उठा। यह दृश्य साधना, त्याग और तप की अखण्ड परंपरा का प्रतीक बना।

नेतृत्व की गरिमामयी उपस्थिति

इस ऐतिहासिक क्षण के साक्षी बने जन्मशताब्दी समारोह के दलनायक एवं देव संस्कृति विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति आदरणीय डॉ. चिन्मय पंड्या जी, साथ ही आदरणीया शैफाली जिजी। उनके नेतृत्व में संपन्न हुआ यह दीप महायज्ञ युग-निर्माण, संस्कार जागरण और राष्ट्रहित के प्रति सामूहिक संकल्प का जीवंत प्रतीक बनकर उभरा।

प्रकाश से संकल्प तक

दीप महायज्ञ का यह दृश्य केवल प्रकाश का आयोजन नहीं था, बल्कि यह संदेश था कि जब विचार, चरित्र और कर्म शुद्ध होते हैं, तभी समाज और राष्ट्र का नव निर्माण संभव होता है। अखण्ड दीपक से प्रज्वलित प्रत्येक दीपक आने वाले युग के लिए आशा, चेतना और परिवर्तन का प्रतीक बन गया।