शताब्दी नगर में आयोजित ध्वज वंदन समारोह के साथ ही गायत्री परिवार की चिर-प्रतीक्षित दिव्य अखंड दीप स्थापना एवं परम वंदनीया माता भगवती देवी शर्मा जी के जन्मशताब्दी महोत्सव का विधिवत शुभारंभ हो गया। इस पावन अवसर पर देश-विदेश से पधारे हजारों श्रद्धालु परिजनों की उपस्थिति ने आयोजन को ऐतिहासिक स्वरूप प्रदान किया।
कार्यक्रम के अंतर्गत आयोजित सामूहिक चर्चा सत्र को संबोधित करते हुए शांतिकुंज व्यवस्थापक आदरणीय श्री योगेंद्र गिरी जी ने जन्मशताब्दी समारोह के आगामी कार्यक्रमों की विस्तृत रूपरेखा प्रस्तुत की। उन्होंने बताया कि यह शताब्दी वर्ष केवल उत्सव नहीं, बल्कि विचार, चरित्र और कर्म के स्तर पर युग परिवर्तन की साधना का अवसर है।
दोपहर कालीन सत्र में गायत्री परिवार के प्रतिनिधि एवं शताब्दी समारोह के दलनायक आदरणीय डॉ. चिन्मय पंड्या जी ने उपस्थित हजारों परिजनों को भावविभोर करते हुए कहा कि आज का यह क्षण हम सभी के लिए एक गहरी आत्मिक पुकार लेकर आया है। उन्होंने आग्रह किया कि इस अवसर पर प्रत्येक व्यक्ति स्वयं को अपनी एकाकी आत्मिक यात्रा पर अनुभव करे और यह भाव जागृत करे कि पूज्य गुरुदेव एवं वंदनीया माता जी ने हमें अपनी गोद में स्थान दिया है।
डॉ. पंड्या जी ने कहा कि हमें यह चिंतन कर संकल्प के साथ लौटना है कि पूज्य गुरुदेव के महान उद्देश्यों की पूर्ति में हमारी व्यक्तिगत भूमिका क्या होगी और उसे हम कैसे सुनिश्चित करेंगे। उन्होंने कार्यकर्ताओं के स्वरूप, केंद्रों की संरचना तथा कार्यक्रमों की दिशा—इन तीन बिंदुओं को भविष्य की स्पष्ट रूपरेखा का आधार बताया।
उन्होंने भावपूर्ण शब्दों में कहा कि उनकी दृष्टि में पूज्य गुरुदेव केवल एक महापुरुष नहीं, बल्कि भगवान थे, क्योंकि उन्होंने समाज के अंतिम व्यक्ति तक की चिंता की। उन्होंने कहा कि गुरुदेव हमारे लिए केवल चित्र, समाधि स्थल या शोध का विषय नहीं, बल्कि वे हमारे लिए जीते-जागते भगवान थे, हैं और रहेंगे। इसी अनुभूति के साथ हम सभी का दायित्व है कि आने वाली पीढ़ियों को वही दिव्य विरासत सौंपें, जिसकी अपेक्षा पूज्य गुरुदेव हमसे करते थे।
अपने उद्बोधन के अंत में उन्होंने पूज्य गुरुदेव के एक वचन को स्मरण करते हुए कहा—
“यदि मैं किसी के जीवन में आता हूँ, तो बुखार की तरह आता हूँ।”
उन्होंने कामना की कि उपस्थित सभी परिजनों को गुरुदेव और माताजी के नाम का ऐसा ‘बुखार’ चढ़े कि उनके अतिरिक्त और कुछ सूझे ही नहीं।
कार्यक्रम में गायत्री परिवार की प्रमुख, स्नेह सलिला शांतिकुंज अधिष्ठात्री श्रद्धेया जीजी ने अपने उद्बोधन में उपस्थित परिजनों के त्याग, तप और समर्पण की भावपूर्ण सराहना की। उन्होंने कहा कि वे कोई भाषण या लेक्चर देने नहीं आई हैं, बल्कि उन भाई-बहनों के प्रति सम्मान व्यक्त करने आई हैं, जो दूर-दूर से कठिन साधनाओं को सहते हुए यहाँ पहुँचे हैं।
श्रद्धेया जीजी ने कहा कि कुछ समय पूर्व तक यह स्थान घने जंगल से घिरा हुआ था, जहाँ सुविधाओं का अभाव था। परंतु परिजनों ने अपने हाथों से लकड़ियाँ काटीं, कंकर-बजरी उठाई, कठिन परिश्रम किया, ठंड और असुविधाओं को सहा, किंतु कभी भी शिकायत नहीं की। उन्होंने कहा कि ऐसे समर्पित कार्यकर्ताओं को स्मरण कर उनका मन करता है कि अपनी श्रद्धा को हथेली पर रखकर उन्हें अर्पित कर दें।
पूरा आयोजन श्रद्धा, संकल्प और साधना के भाव से ओतप्रोत रहा, जिसने जन्मशताब्दी महोत्सव को केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि युग निर्माण की जीवंत साधना में परिवर्तित कर दिया।

