देवसंस्कृति विश्वविद्यालय का सप्तम दीक्षांत समारोह शताब्दी नगर में भव्य रूप से संपन्न

हरिद्वार | 19 जनवरी 2026

पूज्य गुरुदेव की तप-साधना एवं अखंड दीप के प्राकट्य तथा परम वंदनीया माता जी की जन्म शताब्दी के पावन अवसर पर हरिद्वार स्थित वैरागी द्वीप के शताब्दी नगर में एक ऐतिहासिक अध्याय जुड़ गया। इस अवसर पर पूज्य गुरुदेव के स्वप्नों का साकार स्वरूप देवसंस्कृति विश्वविद्यालय भी उस ऐतिहासिक दस्तावेज़ का साक्षी बना, जिसकी गाथा आने वाली पीढ़ियाँ विश्व को सुनाएँगी।

दिनांक 19 जनवरी 2026 को वैरागी द्वीप के शताब्दी नगर में निर्मित विशाल सभागार में देवसंस्कृति विश्वविद्यालय का सप्तम दीक्षांत समारोह भव्य रूप से आयोजित किया गया। समारोह में विश्वविद्यालय के हजारों पूर्व एवं वर्तमान छात्र-छात्राओं तथा उनके परिजनों की गरिमामयी उपस्थिति रही।

कार्यक्रम का शुभारंभ आमंत्रित अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलन एवं परम पूज्य गुरुदेव तथा परम वंदनीया माता जी को पुष्पांजलि अर्पित कर किया गया। राष्ट्रगान एवं कुलगीत के पश्चात सप्तम समावर्तन समारोह 2026 की विधिवत शुरुआत हुई। कुलसचिव श्री बलदाऊ देवांगन के अनुरोध पर प्रतिकुलपति आदरणीय डॉ. चिन्मय पंड्या जी ने दीक्षांत समारोह के आरंभ की घोषणा की।

भारत–यूके संबंधों की मजबूती पर अतिथियों के विचार

हाउस ऑफ लॉर्ड्स, यूनाइटेड किंगडम के सदस्य लॉर्ड कृष रावल जी ने अपने उद्बोधन में कहा कि भारत और यूनाइटेड किंगडम के बीच संबंध अत्यंत मजबूत और घनिष्ठ हैं, जो दोनों देशों के नेतृत्व के लिए विशेष महत्व रखते हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री कीर स्टारमर की ओर से 15 करोड़ सदस्यों वाले गायत्री परिवार को हार्दिक शुभकामनाएँ प्रेषित कीं। भारत की भूमिका की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि देश मूल्य-आधारित समाज और ऐसे युवा नेतृत्व का निर्माण कर रहा है, जो ज्ञान को चरित्र से जोड़कर विश्व को दिशा और प्रकाश प्रदान कर रहा है।

शताब्दी समारोह को ऐतिहासिक बताते हुए उन्होंने माता जी के अवतरण के 100 वर्ष तथा शाश्वत ज्योति के प्रज्वलन के 100 वर्ष पूर्ण होने का उल्लेख किया और इसे विश्वास, अनुशासन एवं आंतरिक चेतना का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि यह अवसर विश्व में गायत्री परिवार की स्थायी और सकारात्मक भूमिका को दर्शाता है।

इसके पश्चात हाउस ऑफ लॉर्ड्स, यूके के सदस्य लॉर्ड मेंडलसन ने हजारों की संख्या में उपस्थित विद्यार्थियों एवं परिजनों को संबोधित करते हुए कहा कि देवसंस्कृति विश्वविद्यालय में उपस्थित होना उनके लिए अत्यंत सम्मान की बात है। उन्होंने स्नातक विद्यार्थियों को बधाई देते हुए कहा कि आज का दिन उनके वर्षों के अनुशासन, परिश्रम और त्याग का प्रतीक है—न केवल विद्यार्थियों का, बल्कि उनके परिवारों और शिक्षकों का भी।

उन्होंने कहा कि विद्यार्थी इस विश्वविद्यालय से केवल डिग्रियाँ ही नहीं, बल्कि उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण मूल्य लेकर जा रहे हैं—अपने जीवन की दिशा स्वयं चुनने की स्वतंत्रता। यह स्वतंत्रता एक विशेषाधिकार है, किंतु इसके साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी हुई है।

लॉर्ड मेंडलसन ने देवसंस्कृति विश्वविद्यालय की अवधारणा की प्रशंसा करते हुए कहा कि यह संस्थान उस विचार का प्रतिनिधित्व करता है, जिस पर वे गहराई से विश्वास रखते हैं। उनके अनुसार शिक्षा केवल ज्ञान अर्जन तक सीमित नहीं है, बल्कि इस बात पर निर्भर करती है कि उस ज्ञान का उपयोग सही समय पर, सही उद्देश्य के लिए कैसे किया जाए।

उन्होंने विश्वविद्यालय की प्रगति, उपलब्धियों और वैश्विक प्रतिष्ठा की सराहना करते हुए कहा कि गुरुदेव और माता जी द्वारा स्थापित मार्ग असाधारण और प्रेरणादायक है। माता जी के संदेशों की शताब्दी एवं शाश्वत ज्योति के शताब्दी वर्ष का साक्षी बनने पर उन्होंने कृतज्ञता व्यक्त की। उन्होंने डॉ. साहब एवं जीजी डॉ. चिन्मय पंड्या जी की विशेष प्रशंसा करते हुए कहा कि डॉ. चिन्मय जी विश्व के प्रमुख आध्यात्मिक नेताओं में से एक हैं, जिनकी प्रेरणा से देवसंस्कृति विश्वविद्यालय एक प्रभावशाली और विश्वस्तरीय संस्थान के रूप में स्थापित हुआ है।

कुलपति का प्रेरक संबोधन

देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति आदरणीय डॉ. चिन्मय पंड्या जी ने अपने प्रेरक संबोधन में कहा कि यह उपाधियाँ मात्र प्रमाण-पत्र नहीं हैं, बल्कि जीवन की दिशा बताने वाले संकेत और मानचित्र हैं। उन्होंने कहा कि ईश्वर ने मनुष्य को असंख्य संभावनाओं के साथ इस धरती पर भेजा है। यदि जीवन की दिशा भटक जाए—सोच, भावना, जीवन-शैली और दृष्टिकोण विकृत हो जाए—तो व्यक्ति पतन की ओर बढ़ने लगता है।

आचार्य शंकराचार्य का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जीवन में पतन सीढ़ियों से गिरती गेंद की तरह होता है, जो धीरे-धीरे नीचे की ओर गिरती जाती है। किंतु देवसंस्कृति विश्वविद्यालय की उपाधि उस दूसरी संभावना की ओर संकेत करती है, जहाँ चिंतन ऊर्ध्व दिशा में प्रवाहित हो, चरित्र और व्यक्तित्व ऊँचाइयों की ओर अग्रसर हों और भीतर प्रकाश, आर्य भावना तथा उदारता विकसित हो।

उन्होंने कहा कि यही मार्ग व्यक्ति को संत, महात्मा, देवत्व और अंततः परमात्मा की अनुभूति की ओर ले जाता है। मनुष्य में देवत्व का उदय ही धरती पर स्वर्ग की स्थापना का जीवंत उदाहरण है।

स्वामी अवधेशानंद गिरि जी का संदेश

महामंडलेश्वर एवं जूना अखाड़ा अध्यक्ष परम पूज्य स्वामी अवधेशानंद गिरि जी महाराज ने अपने उद्बोधन में कहा कि अखिल विश्व गायत्री परिवार द्वारा किया गया जन-जागरण कार्य ऐतिहासिक है। उन्होंने कहा कि गायत्री परिवार केवल एक आध्यात्मिक संगठन नहीं, बल्कि एक व्यापक सांस्कृतिक आंदोलन है, जिसने युग चेतना को जाग्रत किया है।

उन्होंने कहा कि शांतिकुंज के माध्यम से वेदांत की अवधारणाएँ—प्रज्ञा, ऋतंभरा और अमृता—को विचार से व्यवहार तक जीवंत किया गया है। गायत्री परिवार ने अंधविश्वासों, रूढ़ियों और सामाजिक वर्जनाओं को तोड़ते हुए नर-नारी समानता, छुआछूत उन्मूलन और ‘हम सब एक हैं’ जैसे मूल्यों को जन-आंदोलन का स्वरूप दिया है।

स्वामी अवधेशानंद गिरि जी ने आदरणीय डॉ. चिन्मय पंड्या जी के कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि उनके अंतरराष्ट्रीय प्रवासों के साथ-साथ सुदूर वनवासी, गिरिवासी, आदिवासी, दलित, वंचित और शोषित वर्गों के बीच किए जा रहे सेवा कार्य गायत्री परिवार की मानवीय और सामाजिक प्रतिबद्धता को और अधिक सशक्त बनाते हैं।

विशिष्ट अतिथियों की उपस्थिति

इस गरिमामय अवसर पर डॉ. विजय दस्माना (अध्यक्ष, स्वामी राम हिमालयन विश्वविद्यालय), डॉ. दिवाकर सिंह जी (कुलाधिपति, सरदार पटेल विश्वविद्यालय, बालाघाट), डॉ. अजय तिवारी जी (कुलाधिपति, स्वामी विवेकानंद विश्वविद्यालय, सागर), प्रो. शोभित माथुर जी (कुलपति, ऋषि हूड विश्वविद्यालय), प्रो. सतीश कुमार शर्मा जी (कुलपति, सूरजमल विश्वविद्यालय), प्रो. दिनेश शास्त्री जी (पूर्व कुलपति, उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय), उद्योगपति फिरोज़ी मिस्त्री, जहान मिस्त्री, तथा श्री कार्तिकेय जौहरी (भारतीय राजदूत, पोलैंड) सहित अनेक विशिष्ट जनों की उपस्थिति रही।