बलौद (छत्तीसगढ़)।
छत्तीसगढ़ प्रवास के अंतर्गत आदरणीय डॉ. चिन्मय पांड्या जी ने बलौद में आयोजित शक्ति संवर्धन 108 कुंडीय गायत्री महायज्ञ एवं दीप महायज्ञ कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज कराई। इस पावन अवसर पर उन्होंने विशाल जनसमूह को संबोधित करते हुए यज्ञ, दीपयज्ञ और आध्यात्मिक साधना के व्यापक सामाजिक-मानवीय महत्व पर प्रकाश डाला।
कार्यक्रम स्थल पर पारंपरिक वैदिक वातावरण, अनुशासनबद्ध आयोजन और श्रद्धालुओं की अपार उपस्थिति ने आयोजन को एक भव्य आध्यात्मिक उत्सव का स्वरूप प्रदान किया। मंच पर आगमन के दौरान आदरणीय डॉ. चिन्मय पांड्या जी का उपस्थित परिजनों एवं आयोजकों द्वारा भावपूर्ण स्वागत किया गया। जनसमूह ने श्रद्धा एवं उल्लास के साथ उनका अभिनंदन किया।
अपने प्रेरणादायी उद्बोधन में आदरणीय डॉ. चिन्मय पांड्या जी ने कहा कि “दीपयज्ञ केवल एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि अंधकार से प्रकाश की ओर अग्रसर होने की साधना है। यह अंतःकरण के दीप को प्रज्वलित करने का माध्यम है, जिससे व्यक्ति स्वयं भी प्रकाशित होता है और समाज को भी प्रकाश प्रदान करता है।” उन्होंने आगे कहा कि परम वंदनीया माताजी की जन्मशताब्दी एवं दिव्य अखंड दीप के शताब्दी वर्ष के इस पावन काल में प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह आत्मशुद्धि, सद्भाव और सेवा भाव को अपने जीवन में उतारे।
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में महिला-पुरुष श्रद्धालुओं, साधकों एवं गायत्री परिवार के कार्यकर्ताओं की सहभागिता रही। यज्ञ एवं दीप महायज्ञ के माध्यम से राष्ट्र और समाज के लिए आध्यात्मिक सुरक्षा कवच निर्मित करने का संदेश दिया गया। उपस्थित जनसमूह ने आदरणीय डॉ. चिन्मय पांड्या जी के विचारों को गंभीरता से आत्मसात करते हुए आध्यात्मिक एवं नैतिक मूल्यों के अनुरूप जीवन जीने का संकल्प लिया।
उल्लेखनीय है कि हरिद्वार में चल रहे परम वंदनीया माताजी एवं दिव्य अखंड दीप के शताब्दी समारोहों की तैयारियों के समानांतर, देश के विभिन्न भागों में यज्ञ-अनुष्ठानों के माध्यम से जनजागरण का यह क्रम निरंतर आगे बढ़ रहा है। बलौद में आयोजित यह महायज्ञ उसी अखंड आध्यात्मिक अभियान की एक सशक्त कड़ी के रूप में सम्पन्न हुआ।

